शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

तुझे लोग गुनगुनाएँगे

किसी किताब में सिमटी हुई ग़ज़ल की तरह
न घर में बैठ तुझे लोग गुनगुनाएँगे

तू इन्कलाब है किस्मत संवार सकती है
ये जंगबाज तेरी पालकी उठाएंगे

ये तेरी उम्र, तेरा जोश, ये तेरे तेवर
बुझे दिलों में नया जलजला जगाएंगे

फटी जमीन तो शोले उठेंगे सागर से
कहाँ तलक वो तेरा हौसला दबायेंगे

झुका-झुका के कमर तोड़ दी गई जिनकी
वो आज मिलके ज़माने का सर झुकायेंगे
( हिंदुस्तान दैनिक लखनऊ में प्रकाशित )
-वीरेंद्र वत्स

4 टिप्‍पणियां:

Dr. Mahesh Sinha ने कहा…

इन्कलाब जिंदाबाद

चंदन कुमार झा ने कहा…

बहुत ही जोशपूर्ण रचना.....बहुत सुन्दर. आभार.

चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.

कॄप्या word verification हटा दें टिप्प्णी करने में सुविधा होती है. आभार

गुलमोहर का फूल

योगेश स्वप्न ने कहा…

फटी जमीन तो शोले उठेंगे सागर से
कहाँ तलक वो तेरा हौसला दबायेंगे


bahut umda. badhai, blog jagat men swagat hai.

gargi gupta ने कहा…

आप की रचना प्रशंसा के योग्य है . आशा है आप अपने विचारो से हिंदी जगत को बहुत आगे ले जायंगे
लिखते रहिये
चिटठा जगत मे आप का स्वागत है
गार्गी