शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

...सुन सको तो सुनो

इश्क का दर्द जाम के किस्से वो ग़ज़ल है गए ज़माने की
वत्स आवाज़ आम जनता की, बात उसकी नए ज़माने की

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ये दास्ताने बगावत है सुन सको तो सुनो
तुम्हीं से उनकी अदावत है सुन सको तो सुनो

सियाह रात में सपने जवां हुए उनके
तुम्हें तो जश्न की आदत है सुन सको तो सुनो

जला है गाँव जले साथ अनछुए अरमां
पता है किसकी शरारत है सुन सको तो सुनो

लुटे-पिटे हैं मगर हौसले उबलते हैं
दिलों में आग सलामत है सुन सको तो सुनो

ये बाढ़ खुद ही नए रास्ते बना लेगी
तुम्हारे सर पे कयामत है सुन सको तो सुनो

मनाओ खैर अभी और कुछ नहीं बिगड़ा
उठा लो जो भी शिकायत है सुन सको तो सुनो
-वीरेन्द्र वत्स
(युग तेवर में प्रकाशित)

रविवार, 8 नवंबर 2009

...इश्क साया है आदमी के लिए

दिल लगाना न दिल्लगी के लिए,
ये इबादत है ज़िन्दगी के लिए.

इश्क दाना है, इश्क पानी है,
इश्क साया है आदमी के लिए.

ये किसी एक का नहीं यारो,
ये इनायत है हर किसी के लिए.

मेरा हर लफ्ज़ है अमन के लिए,
मेरी हर साँस बंदगी के लिए,

मैं हवा के खिलाफ चलता हूँ,
सिर्फ इंसान की खुशी के लिए.

वीरेन्द्र वत्स