सोमवार, 19 अगस्त 2013

लबों पर गालियाँ

सभा में तालियाँ हैं और हम हैं
लबों पर गालियाँ हैं और हम हैं

वही सपने दिखाते आ रहे हैं साठ सालों से
सियासी थालियाँ हैं और हम हैं

उन्हें है धर्म से मतलब, उन्हें है जाति की चिन्ता
दरकती डालियाँ हैं और हम हैं ...

कहीं डाका, कहीं दंगा, कहीं आतंक का साया
लहू की नालियाँ हैं और हम हैं
वीरेन्द्र वत्स

राजकाज

अजब नेता, अजब अफसर
तरक्की का अजब खाका
इन्हें ठेका, उन्हें पट्टा 
यहाँ चोरी, वहां डाका
बजट जितना, घोटाला कर गए उससे कहीं ज्यादा
गया जो जेल प्यादा था
बचे बेदाग़ फिर आक़ा
मिली है जीत कुनबे को, बधाई हो-बधाई हो
जियो भैया, जियो बाबू
जियो लल्ला, जियो काका
हुकूमत क्या मिली, सारा खजाना अब इन्हीं का है
बिकी मिट्टी, बिका पानी
बिका नुक्कड़, बिका नाका
वहां तो महफ़िलों का दौर है, प्याले छलकते हैं
यहाँ है टीस, लाचारी
सुबह से रात तक फाक़ा
वीरेन्द्र वत्स  

गुरुवार, 30 मई 2013

खुद पे इतना भी एतबार नहीं...

आप कुछ यूं उदास होते हैं
रेत में कश्तियाँ डुबोते हैं

खुद पे इतना भी एतबार नहीं
गैर की गलतियाँ संजोते हैं

लोग क्यूं आरजू में जन्नत की
जिंदगी का सुकून खोते हैं

जब से मज़हब में आ गए कांटे
हम मोहब्बत के फूल बोते हैं

बज्म के कहकहे बताते हैं
आप तन्हाइयों में रोते हैं

(युग तेवर में प्रकाशित)

-वीरेन्द्र वत्स