रविवार, 20 सितंबर 2009

अब उन्हें इस ज़मीन पर लाओ...

लोग यूं बेजबान होते हैं
दर्द पीकर जवान होते हैं

क्यूं सुलगती सुबह की आँखों में
बेबसी के निशान होते हैं

हैं ये बेजान नींव की ईंटें
हाँ इन्हीं से मकान होते हैं

ये दिखाती हैं खिसकने का हुनर
जब कभी इम्तिहान होते हैं

चाँद-तारों की बात मत छेडो
वो खयालों की शान होते हैं

अब उन्हें इस जमीन पर लाओ
जो सरे आसमान होते हैं
( युग तेवर में प्रकाशित )

-वीरेन्द्र वत्स

6 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत बढिया लिखा है .. बधाई !!

M VERMA ने कहा…

"उन्हें इस जमीन पर लाओ"
बहुत जरूरी है जमीन पर लाना -
सार्थक आह्वान --

वाणी गीत ने कहा…

हैं ये बेजान नींव की ईंटें
हाँ इन्हीं से मकान होते हैं
बहुत सही ...बेजान इतने मजबूत नींव का आधार होती है ...सुन्दर अभिव्यक्ति ..!!

Udan Tashtari ने कहा…

ये दिखाती हैं खिसकने का हुनर
जब कभी इम्तिहान होते हैं

-बहुत बेहतरीन रचना, बधाई.

बेनामी ने कहा…

wah vats ji wah aapki rachna shaili bahut umda hai

hitesh ने कहा…

चाँद-तारों की बात मत छेडो
वो खयालों की शान होते हैं
...क्या लाइन लिखी है. मजा आ गया.