शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

...सुन सको तो सुनो

इश्क का दर्द जाम के किस्से वो ग़ज़ल है गए ज़माने की
वत्स आवाज़ आम जनता की, बात उसकी नए ज़माने की

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ये दास्ताने बगावत है सुन सको तो सुनो
तुम्हीं से उनकी अदावत है सुन सको तो सुनो

सियाह रात में सपने जवां हुए उनके
तुम्हें तो जश्न की आदत है सुन सको तो सुनो

जला है गाँव जले साथ अनछुए अरमां
पता है किसकी शरारत है सुन सको तो सुनो

लुटे-पिटे हैं मगर हौसले उबलते हैं
दिलों में आग सलामत है सुन सको तो सुनो

ये बाढ़ खुद ही नए रास्ते बना लेगी
तुम्हारे सर पे कयामत है सुन सको तो सुनो

मनाओ खैर अभी और कुछ नहीं बिगड़ा
उठा लो जो भी शिकायत है सुन सको तो सुनो
-वीरेन्द्र वत्स
(युग तेवर में प्रकाशित)

13 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा गज़ल!

योगेश स्वप्न ने कहा…

suni, behad umda rachna,

faeem khan ने कहा…

मनाओ खैर अभी और कुछ नहीं बिगड़ा
उठा लो जो भी शिकायत है सुन सको तो सुनो
...... kabile tareef.

ayush singh ने कहा…

....बहुत उम्दा गज़ल है

rakesh kumar ने कहा…

बात तो नए ज़माने की ही है.

vivek ने कहा…

...बहुत खूब विरेन्द्र जी

sandhyagupta ने कहा…

Bahut khub likha hai.Badhai.

hitesh ने कहा…

ये बाढ़ खुद ही नए रास्ते बना लेगी
kya khoob likha hai.

umesh (tesar) ने कहा…

virendra ji दास्ताने बगावत ki khoob sunai.

sanjay kumar ने कहा…

virendra ji rachna khoob jachi.

Sonalika ने कहा…

जला है गाँव जले साथ अनछुए अरमां
पता है किसकी शरारत है सुन सको तो सुनो

sunder rachana

Sonalika ने कहा…

जला है गाँव जले साथ अनछुए अरमां
पता है किसकी शरारत है सुन सको तो सुनो

sunder rachana

Vishal ने कहा…

Bahut achhe. Aapse main kafi kuchh sikh sakta hoon.