संदेश

लबों पर गालियाँ

सभा में तालियाँ हैं और हम हैं लबों पर गालियाँ हैं और हम हैं वही सपने दिखाते आ रहे हैं साठ सालों से सियासी थालियाँ हैं और हम हैं उन्हें है धर्म से मतलब, उन्हें है जाति की चिन्ता दरकती डालियाँ हैं और हम हैं ... कहीं डाका, कहीं दंगा, कहीं आतंक का साया लहू की नालियाँ हैं और हम हैं वीरेन्द्र वत्स

राजकाज

अजब नेता, अजब अफसर तरक्की का अजब खाका इन्हें ठेका, उन्हें पट्टा  यहाँ चोरी, वहां डाका बजट जितना, घोटाला कर गए उससे कहीं ज्यादा गया जो जेल प्यादा था बचे बेदाग़ फिर आक़ा मिली है जीत कुनबे को, बधाई हो-बधाई हो जियो भैया, जियो बाबू जियो लल्ला, जियो काका हुकूमत क्या मिली, सारा खजाना अब इन्हीं का है बिकी मिट्टी, बिका पानी बिका नुक्कड़, बिका नाका वहां तो महफ़िलों का दौर है, प्याले छलकते हैं यहाँ है टीस, लाचारी सुबह से रात तक फाक़ा वीरेन्द्र वत्स  
खुद पे इतना भी एतबार नहीं... आप कुछ यूं उदास होते हैं रेत में कश्तियाँ डुबोते हैं खुद पे इतना भी एतबार नहीं गैर की गलतियाँ संजोते हैं लोग क्यूं आरजू में जन्नत की जिंदगी का सुकून खोते हैं जब से मज़हब में आ गए कांटे हम मोहब्बत के फूल बोते हैं बज्म के कहकहे बताते हैं आप तन्हाइयों में रोते हैं (युग तेवर में प्रकाशित) -वीरेन्द्र वत्स

उन्हें भी वार करना आ गया है...

अदब से सिर झुकाए जो खड़े थे, उन्हें भी वार करना आ गया है. समेटो जालिमो दूकान अपनी, उन्हें व्यापार करना आ गया है. दिलों में फड़फड़ाती आरज़ू का, उन्हें इज़हार करना आ गया है. तुम्हारी बात पर जो मर-मिटे थे, उन्हें इनकार करना आ गया है. कि अपने वक़्त पर अपनी जमीं पर, उन्हें अधिकार करना आ गया है. (युग तेवर में प्रकाशित) -वीरेन्द्र वत्स

नया वर्ष नई मंजिलें

चलें आप सूरज के रथ पर बनें उजाले के प्रतिमान; घर-आँगन खुशियों से भर दे नए वर्ष का स्वर्ण विहान. नए साल में नई मंजिलें कदम आपके चूमें, भाग्य-लक्ष्मी की बाहों में आप खुशी से झूमें. -वीरेन्द्र वत्स

...सुन सको तो सुनो

इश्क का दर्द जाम के किस्से वो ग़ज़ल है गए ज़माने की वत्स आवाज़ आम जनता की, बात उसकी नए ज़माने की  ...                        ...                            ... ये दास्ताने बगावत है सुन सको तो सुनो तुम्हीं से उनकी अदावत है सुन सको तो सुनो सियाह रात में सपने जवां हुए उनके तुम्हें तो जश्न की आदत है सुन सको तो सुनो जला है गाँव जले साथ अनछुए अरमां पता है किसकी शरारत है सुन सको तो सुनो लुटे-पिटे हैं मगर हौसले उबलते हैं दिलों में आग सलामत है सुन सको तो सुनो ये बाढ़ खुद ही नए रास्ते बना लेगी तुम्हारे सर पे कयामत है सुन सको तो सुनो मनाओ खैर अभी और कुछ नहीं बिगड़ा उठा लो जो भी शिकायत है सुन सको तो सुनो -वीरेन्द्र वत्स (युग तेवर में प्रकाशित)

...इश्क साया है आदमी के लिए

दिल लगाना न दिल्लगी के लिए, ये इबादत है ज़िन्दगी के लिए. इश्क दाना है, इश्क पानी है, इश्क साया है आदमी के लिए. ये किसी एक का नहीं यारो, ये इनायत है हर किसी के लिए. मेरा हर लफ्ज़ है अमन के लिए, मेरी हर साँस बंदगी के लिए, मैं हवा के खिलाफ चलता हूँ, सिर्फ इंसान की खुशी के लिए. वीरेन्द्र वत्स